*स्कूल शिक्षा विभाग मे पदोन्नति एक चक्र व्यूह -जिसे कोई भेद पायेगा या नहीं!*

*व्यवस्था की पदोन्नति का लड्डू खाओ भी, छोड़ो भी नहीं* की

*‘यथा-स्थान’ के जाल में उलझे शिक्षक, नई पोस्टिंग का पता नहीं और परित्याग का अधिकार भी गायब*

*अंधेरे में पदोन्नति स्वीकार करो, फिर किस्मत के भरोसे पोस्टिंग का इंतजार करो..*

*राजस्थान शिक्षा विभाग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रशासनिक कल्पनाशीलता में उसका कोई सानी नहीं। विभाग की नवीनतम व्यवस्था के अनुसार शिक्षक को पहले पदोन्नति स्वीकार कर उसी विद्यालय में उच्च पद का कार्यभार ग्रहण करना होगा, लेकिन उसे यह जानने का अधिकार नहीं होगा कि भविष्य में उसकी वास्तविक पदस्थापना कहां होने वाली है। अर्थात् पहले ट्रेन में बैठ जाइए, टिकट बाद में बताएगी कि जाना कहां है।*
*इसीलिए राजस्थान का स्कूली शिक्षा विभाग एक प्रयोगशाला कहा जाने लगा है क्यूंकि यंहा उच्च स्तर पर विद्यार्थियों के लिए नहीं बल्कि प्रशासनिक स्तर पर विभाग को चलाने के लिए प्रयोग किये जाते थे -एवम हो रहे है l*
*जिसके कारण पूरा शिक्षा निदेशालय एक लबोरटरी के रूप मे कुख्यात हो चुका है l*
*अब देखना यह है की स्कूल शिक्षा मंत्री मदन दिलावर इस कुख्यात नाम से विभाग को निजात दिला पाते है या नहीं?*
*फिलहाल इस यक्ष प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ मे दफ़न है!*
*स्थिति इतनी रोचक है कि यदि किसी शिक्षक को बाद में पता चले कि उसकी पोस्टिंग घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर होने वाली है और वह पारिवारिक कारणों से पदोन्नति त्यागना चाहता है, तो विभाग का संदेश साफ है—अब बहुत देर हो चुकी है। आप पदोन्नति के चक्रव्यूह में प्रवेश कर चुके हैं, निकलने का मार्ग विभागीय फाइलों में उपलब्ध नहीं है।*
*दिलचस्प बात यह है कि नियमों की यह कठोरता केवल आम शिक्षकों के लिए है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि कुछ भाग्यशाली और प्रभावशाली लोगों के लिए सूची बदलना उतना ही आसान है जितना मोबाइल में प्रोफाइल फोटो बदलना।* *आम शिक्षक महीनों तक पोस्टिंग सूची का इंतजार करता रहता है, जबकि कुछ विशेष लोगों के लिए व्यवस्था रातों-रात ‘मानवीय’ हो जाती है।*
*राधाकृष्णन संघ के प्रदेश अध्यक्ष विजय सोनी का कहना है कि इस यथास्थान कार्यग्रहण व्यवस्था की नींव भले ही पिछली कांग्रेस सरकार ने रखी हो, लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार से शिक्षकों को उम्मीद थी कि वह इस उलझी हुई व्यवस्था को सरल बनाएगी।*,*दुर्भाग्यवश सत्ता बदली, चेहरे बदले, लेकिन शिक्षक की परेशानी और विभागीय जड़ता जस की तस बनी हुई है।*
*राधाकृष्णन संघ आम शिक्षक की और से पूछ रहा है कि यदि उसे यह भी नहीं पता कि पदोन्नति के बाद जाना कहां है, तो वह स्वीकार या परित्याग का निर्णय किस आधार पर करे..!!*
*पहले हां भरवाइए, फिर रास्ता दिखाइए,*
*ऐसे नियम बनाकर क्यों सबको आज़माइए।*
*पोस्टिंग का पता नहीं, आदेशों की भरमार,*
*शिक्षक पूछे किस तरफ़ जाऊँ, विभाग रहे लाचार।।*

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