*अब मास्टरजी, गड्ढे खोदकर पौधे लगायेंगे शिक्षा विभाग का तुगलकी फरमान हुवा जारी*

*राधाकृष्णन शिक्षक संघ नें शुरु किया आदेश का विरोध*

*की आदेश वापस लेने की मांग*

*शिक्षा विभाग ने निकाला 20 जून तक गड्ढे खोदने की समयसीमा  की निर्धारित*
*(पवन राठी )*
*समझ में नहीं आता, शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए नौकरी करते हैं या गड्ढे खोदने के लिए बेलदारी*
*राजस्थान के शिक्षा विभाग ने ’’हरियालो राजस्थान’’ अभियान के तहत प्रत्येक शिक्षक को साढ़े चार सौ पौधे लगाने और उसके लिए गड्ढे भी खुद खोदने का तुगलकी फरमान जारी किया है। इन शिक्षकों को बीस जून तक गड्ढे खोदने की समयसीमा दी गई है। शिक्षकों से अब बस यही काम कराना बाकी रह गया था, जिसकी भी पूर्ति कर दी गई है। यह तुगलकी फरमान तब निकाला गया है, जबकि प्रदेश में ग्रीष्मकालीन अवकाश यानी गर्मी की छुटि्टयां चल रही हैं। आपको पता ही है कि स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय सप्ताह में छह दिन चलते हैं। शिक्षकों को सुबह जल्द भी जाना पड़़ता है। इसलिए वर्षों से ग्रीष्मावकाश की व्यवस्था की हुई है। अब शिक्षा विभाग के जरूरत से ज्यादा चतुर अफसरों से कोई यह पूछे कि क्या एक-एक शिक्षक इतने पौधे लगा सकते हैं। यदि वे इतने पौधे लगाने में जुट गए, तो स्कूलों में बच्चों का क्या खाक पढ़ाएंगे? नया शैक्षिक सत्र एक जुलाई से शुरू होने वाला है, ऐसे में पहले शिक्षक बीस जून तक तो गड्ढे खोदेंगे और फिर उसके बाद उनमें पौधे लगाएंगे। वाह री सरकार और वाह रे अफसरों। अब आप खुद ही सोचो, क्या प्रत्येक शिक्षक से बीस जून तक गड्ढे खोदने की उम्मीद की जा सकती है? क्या यह शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए नौकरी कर रहे हैं या गड्ढे खोदने के लिए? क्या ये शिक्षक बेलदार या गड्ढे खोदने वाले मजदूर हैं? अब अफसर खुद यह बताएं कि शिक्षकों की जिम्मेदारी गड्ढे खोदकर पौधे लगाने की है या स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की? अगर शिक्षा विभाग यह आदेश देता कि प्रत्येक शिक्षक को अपने-अपने स्कूल परिसर औेर आसपास के क्षेत्रों में एक-एक पौधे लगाकर उनकी नियमित रूप से देखभाल करनी है, तो बात कुछ समझ में भी आती। बात यहीं खत्म नहीं होती। प्रत्येक सप्ताह हर शनिवार को ’’नो बैग डे’’ के दिन शिक्षकों को इन पौधों की सार-संभाल भी करनी है यानी शिक्षक इस दिन पूरा समय अपने द्वारा गड्ढे खोदकर लगाए गए पौधों की देखभाल करेंगे, पानी डालेंगे।*
*पढ़ाई कराने के अलावा बाकी सब काम कराए जाते हैं*
*शिक्षकों को वैसे भी अध्यापन कराने के अलावा भी अन्य योजनाओं और कार्यक्रमों में झोंक दिया जाता है। दुहाई राष्ट्रीय कार्यक्रम की दी जाती है। इन दिनों जनगणना चल रही है, उसमें भी कमोबेश सभी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और गैरशैक्षणिक कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई हुई है। इसके अलावा पल्स पोलियो कार्यक्रम हो, स्वच्छता अभियान हो, पशुओं की गणना हो, चुनाव हो, मतदाता जागरूकता कार्यक्रम हो, शिक्षकों को जोत दिया जाता है। फिर शिक्षकों पर सौ प्रतिशत परीक्षा परिणाम देने का ’’विभागी डंडा’’ चलाया जाता है। यही नहीं, जब परीक्षाओं के परिणाम आते हैं, तो सरकारी स्कूलों की प्राइवेट स्कूलों से तुलना की जाती है। अफसरों को क्या यह बात समझ में नहीं आती है कि प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों को भले ही वेतन या मानदेय कम मिलता हो, लेकिन उन्हें पढ़ाई कराने के अलावा अन्य किसी भी काम में नहीं जोता है। इन स्कूलों में शिक्षक केवल बच्चों को पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों से बाकी सब काम कराए जाते हैं, केवल पढ़ाई नहीं कराई जाती है। राजस्थान शिक्षक संघ राधाककृष्णन् ने शिक्षा विभाग के इस तुगलकी फरमान के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए जारी आदेश को वापस लेने की मांग की है।*

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